Rajasthan Sanskrit University

Rajasthan Sanskrit University : Vacant Positions

राजस्थान (Rajasthan) , जिसे अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और ‘देववाणी’ संस्कृत के संरक्षण के लिए जाना जाता है, आज उसी भाषा की शिक्षा के क्षेत्र में एक बड़े संकट से जूझ रहा है। प्रदेश के संस्कृत विद्यालयों की स्थिति लगातार चिंताजनक होती जा रही है। हाल ही में राजस्थान विधानसभा के पांचवें सत्र में विधायक बालमुकुंदाचार्य द्वारा उठाए गए एक तारांकित प्रश्न (संख्या 1249) के उत्तर में जो सरकारी आंकड़े सामने आए हैं, वे चौंकाने वाले हैं।

प्रदेश के संस्कृत विद्यालयों में न केवल शिक्षकों की भारी कमी है, बल्कि मंत्रालयिक कर्मचारियों के पद भी वर्षों से रिक्त पड़े हैं। नए विषयों को लेकर सरकार के पास कोई ठोस कार्ययोजना नहीं है, जिससे छात्रों का रुझान इस प्राचीन भाषा से कम हो रहा है। कुल स्वीकृत पदों में से लगभग 43% पद खाली होना यह दर्शाता है कि राज्य की शैक्षिक नींव कितनी कमजोर हो चुकी है। सबसे बुरा प्रभाव ग्रामीण क्षेत्रों के छात्रों पर पड़ रहा है, जहाँ शिक्षक न होने के कारण स्कूल केवल भवनों तक सीमित रह गए हैं।

Sanskrit College

सरकारी आंकड़ों के विश्लेषण से पता चलता है कि राजस्थान के संस्कृत शिक्षा विभाग में कुल 14,130 स्वीकृत पद हैं, जिनमें से 6,142 पद रिक्त पड़े हैं। इसका अर्थ यह है कि विभाग का लगभग 43% ढांचा केवल कागजों पर चल रहा है। सबसे बुरा प्रभाव शिक्षण कार्य पर पड़ रहा है। प्राथमिक स्तर (लेवल-1) से लेकर उच्च माध्यमिक स्तर (लेवल-2 और व्याख्याता) तक, हर मोर्चे पर शिक्षकों की कमी है। जब कक्षाओं में शिक्षक ही नहीं होंगे, तो नई पीढ़ी को संस्कृत के ज्ञान से कैसे जोड़ा जाएगा |

Statistical Analysis Of Vacant Position :

सरकारी आंकड़ों के अनुसार, प्रदेश में संस्कृत शिक्षा विभाग की स्थिति को निम्नलिखित तालिकाओं के माध्यम से समझा जा सकता है :

विवरणसंख्या / प्रतिशत
Total Positions14,130
Vacant Post6,142
Percentage Of Vacancy 43.46%

Assembly Data : Vacancy Positions Overview

CategorySanctioned PostsVacant Posts
Total Positions (Overall)14,1306,142
Teacher Level-13,58731*
Teacher Level-23,6372,546
Senior Teachers / Lecturers(Significant Gaps)Thousands Vacant

नोट: आंकड़ों के अनुसार वरिष्ठ अध्यापक और व्याख्याता स्तर पर भी रिक्तियों का प्रतिशत काफी अधिक है, जिससे उच्च शिक्षा पूरी तरह प्रभावित हो रही है।

Rajasthan Sanskrit University :The Direct Impact Of Teacher Shortage 

जब विद्यालयों में शिक्षक ही नहीं होंगे, तो नए विषयों पर कोई ठोस योजना बनाना तो दूर की बात है, वर्तमान पाठ्यक्रम को पूरा करना भी असंभव हो जाता है।

  1. अध्यापक लेवल-2 की बदहाली: सबसे चौंकाने वाली स्थिति लेवल-2 की है, जहाँ 3,637 पदों में से 2,546 पद खाली हैं। यह वह स्तर है जहाँ छात्र विषय की गहरी समझ बनाना शुरू करते हैं।
  2. प्रशासनिक कार्य ठप: केवल शिक्षकों की ही नहीं, बल्कि मंत्रालयिक कर्मचारियों (Non-teaching staff) के हजारों पद खाली होने से विद्यालयों का प्रशासनिक ढांचा भी चरमरा गया है।

Lack Of New Topics And Innovation :

एक ओर हम दुनिया भर में ‘डिजिटल इंडिया’ और ‘आधुनिक शिक्षा’ की बात कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर संस्कृत विद्यालयों में नए विषयों को लेकर कोई ठोस योजना नजर नहीं आती। बिना पर्याप्त स्टाफ के किसी भी नए विषय को शुरू करना केवल कागजी खानापूर्ति बनकर रह जाता है।

Full Stop On Infrastructure And New Topics :

शिक्षकों की कमी के अलावा, सरकार की भविष्य की योजनाओं में भी संस्कृत विद्यालयों के प्रति उत्साह की कमी दिखती है। छात्रावासों का अभावः सरकार ने स्पष्ट कर दिया है कि जिला स्तर पर संस्कृत विद्यालयों के लिए अलग से छात्रावास खोलने का कोई प्रस्ताव विचाराधीन नहीं है। दूर-दराज के गांवों से आने वाले विद्यार्थियों के लिए यह एक बड़ी बाधा है।

नए विषयों पर निराशाः संस्कृत के साथ आधुनिक और प्रासंगिक विषयों (जैसे आयुर्वेद) को जोड़ने की मांग लंबे समय से की जा रही थी, लेकिन सरकार ने फिलहाल ऐसे किसी भी प्रस्ताव से इनकार कर दिया है।

मंत्रालयिक कर्मचारियों की कमीः कनिष्ठ सहायक और चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों के लगभग 80-90% पद खाली होने से विद्यालय के संचालन का भार भी शिक्षकों पर आ गया है।

Experts Opinion And Future Challenges :

शिक्षाविदों का मानना है कि संस्कृत केवल एक भाषा नहीं, बल्कि भारत का ज्ञान-आधार है। यदि राजस्थान में इसी तरह रिक्तियों का अंबार लगा रहा, तो विद्यार्थियों का रुझान इस विषय से पूरी तरह खत्म हो जाएगा। सीमित संसाधन और नई शैक्षणिक योजनाओं की कमी के कारण ये विद्यालय केवल ‘प्रमाणपत्र बांटने वाले केंद्र’ बनकर रह जाएंगे।

The Path To Resolution : What Should Be Done ?

  1. तत्काल भर्ती प्रक्रिया: रिक्त 6,142 पदों पर बिना किसी देरी के पारदर्शी भर्ती आयोजित की जाए।
  2. बुनियादी ढांचा: विद्यालयों में केवल शिक्षक ही नहीं, बल्कि कंप्यूटर लैब और आधुनिक पुस्तकालय भी सुनिश्चित किए जाएं।
  3. जागरूकता अभियान: छात्रों और अभिभावकों को संस्कृत के व्यावसायिक महत्व (जैसे अनुवादक, शिक्षक, और शोधकर्ता) के बारे में बताया जाए।
  4. मंत्रालयिक स्टाफ की नियुक्ति: शिक्षकों पर गैर-शैक्षणिक कार्यों का बोझ कम करने के लिए मंत्रालयिक कर्मचारियों के रिक्त पदों को भी तुरंत भरा जाए।

Conclusion :

राजस्थान की पहचान इसकी समृद्ध परंपराओं से है। यदि हम अपनी ‘देवभाषा’ के संरक्षण के प्रति इतने लापरवाह रहे, तो आने वाली पीढ़ियां हमें कभी माफ नहीं करेंगी। सरकार को ‘अरांकित प्रश्नों’ के उत्तर देने से आगे बढ़कर अब ठोस धरातलीय कार्यवाही करने की आवश्यकता है।

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